रविवार, 28 फ़रवरी 2010

उसके चेहरे पर मेरी उंगलियां

एक शाम जब उसके चेहरे पर
होती हैं मेरी उंगलियां
समंदर से उगने वाली रात
चाहती है किसी तरह मुझसे छू जाए
और शाम बनी रहे घर्षण होने तक

एक शाम जब उसके सीने पर
सिर रखकर सुनना चाहता हूं मैं
बदलते समय के मासूम सवालों का संगीत
रात मेरी जेब में रखी डायरी में
दर्ज होने की प्रार्थना करती है

किसी रात जब मैं
उसके वक्ष पर तन कर
लहराने का यत्न करता हूं
पांच साल पुरानी विधवा सी
वह रात सो नहीं पाती

मुझे यकीन है
उससे दूर रहकर मैं उसे
उससे ज्यादा समझ सकता हूं
पर वह न छू लेने वाले अंगों में भी
ऐसे दौड़ती है, जैसे छू लेगी तो
कभी नहीं रुकेगी दौड़ने में

जिस शाम उसके चेहरे पर होती है मेरी उंगलियां

2 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

अनुभूतियों का सुन्दर चित्रण!!


ये रंग भरा त्यौहार, चलो हम होली खेलें
प्रीत की बहे बयार, चलो हम होली खेलें.
पाले जितने द्वेष, चलो उनको बिसरा दें,
खुशी की हो बौछार,चलो हम होली खेलें.


आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.

-समीर लाल ’समीर’

Suman ने कहा…

आपको तथा आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ.nice

मेरे बारे में

mathura, uttar pradesh, India
पेशे से पत्रकार और केपी ज्योतिष में अध्ययन। मोबाइल नंबर है- 09412777909 09548612647 pawannishant@yahoo.com www.live2050.com www.familypandit.com http://yameradarrlautega.blogspot.com
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