शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

चल दिए हैं पूस के तानाशाह

अभी अभी जड़ था कबूतर
वर्फ की पहाड़ सी परत में
अभी अभी हुआ है चेतन
सूर्य के पहले प्रकाश में

रोंया रोंया शुष्क था मौसम
मौत की पगडंडी पर
अभी अभी पिघला है
जीवन की ताल तलैया में

घर घर सोया पड़ा था आदमी
कुछ सुध कुछ बेसुध
अभी अभी जागा है हौसला
ताल ठोंक कर गांव गांव

शाख शाख पसरी थी रात
चंगेजी ठंड के शासन में
अभी अभी हिनहिनाने लगे हैं घोड़े
चल जो दिए हैं पूस के तानाशाह

1 टिप्पणी:

sandhyagupta ने कहा…

Pavan ji aapki kavita basant ki agvani karti si pratit ho rahi hai.Badhai.

मेरे बारे में

mathura, uttar pradesh, India
पेशे से पत्रकार और केपी ज्योतिष में अध्ययन। मोबाइल नंबर है- 09412777909 09548612647 pawannishant@yahoo.com www.live2050.com www.familypandit.com http://yameradarrlautega.blogspot.com
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