रविवार, 8 नवंबर 2009

महगाई बढ़ाने वालों को पहचानो

क्या केंद्र सरकार जानबूझकर महंगाई बढ़ाने का काम कर रही है। आगरा में बीते दो दिनों से जो कुछ हो रहा है, वह स्वाभाविक ही है। केंद्रीय मंत्रियों के आने वाले बयानों के बाद जिंस से लेकर सोना-चांदी तक की कीमतें जिस तरह बढ़ जाती हैं, उसे अब आम आदमी भी समझने लगा है। एमसीएक्स और केंद्रीय मंत्रियों का सिंडिकेट क्या वास्तव में बन चुका है।
चार दिन पहले केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने बयान दिया कि मंहगाई खरीफ सीजन तक रह सकती है। फिर क्या था, गेहूं का आटा 14 रुपए से बढ़कर 18 रुपए हो गया। चीनी 35 रुपए से 40 रुपए पर पहुंच गयी। दालों के भाव दो से चार रुपए तक बढ़े हैं। चावल पांच रुपए तक महंगा हुआ है। वायदा बाजार में चार दिन पहले तक दिसंबर के अरहर के सौदे 95 रुपए के हो रहे थे, पर पवार के बयान के एक घंटे के अंदर यह 120 रुपए तक उछल गए। पवार के बयान ने फल बाजार में भी आग लगा दी। सेब 40 से 100रुपए हो गया तो सफेद खरबूजा 40 से 70, खजूर 70 से 100 और केला 15 से 22 रुपए किलो हो गया। मसाले भी महंगाई के बुखार से नहीं बच सके। चाय की पत्ती 200 रुपये से ऊपर है। यह मथुरा जैसे छोटे शहर का खुदरा सूचकांक है तो बड़े शहरों की स्थिति समझी जा सकती है।
महंगाई से आम आदमी कराह रहा है और कह रहा है कि तीन राज्यों में जीत के बाद केंद्र सरकार के मंत्री बेलगाम हो चुके हैं। बयान देकर जानबूझकर महंगाई बढ़ाई जा रही है। पांच दिन पहले केंद्र सरकार ने कहा कि चांदी की बिक्री पर कोई असर नहीं पड़ा था। इस बयान के बाद चांदी तेरह सौ रुपए उछल कर 27 हजार के पार हो गयी। अंतर राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने करीब 13 हजार रुपए प्रति दस ग्राम के हिसाब से रेट तय किए हैं, पर भारत ने 6.7 अरब डालर की लागत से सोना खऱीदा है, जो 16 हजार रुपए प्रति दस ग्राम की दर का बैठता है। खऱीद की खबर जैसे ही मीडिया में आयी सोना 17 हजारी हो गया। भारत के कदम पर आईएमएफ के चेयरमैन ने भी हैरानी जतायी है।
सवाल यह उठता है कि सरकार का काम यह बयान देना है कि महंगाई को काबू में रखा जाएगा और जमाखोरों पर लगाम लगायी जाएगी, कि बार-बार महंगाई को उकसाना है। खुद कांग्रेस के अंदर भी इस बयानबाजी के खिलाफ आवाज उठ चुकी है, पर इन वजनदार मंत्रियों का असर इतना है कि खुद पीएम और सोनिया गांधी भी इस खेल को नहीं समझ पा रहे। एमसीएक्स के सिंडिकेट को नई दिल्ली से कौन संचालित करता है, यह किसी से छिपा नहीं है और सत्ता के गलियारों में चरचा में है। सारा खेल इसी के सहारे चल रहा है और आम आदमी की जेब ढीली की जा रही है। कांग्रेस को मुगालता हो गया है कि जनता पर अब मंहगाई का असर नहीं होता।
लोगों का कहना है कि न तो देश में युद्ध के हालात हैं और न अकाल पड़ा है, लेकिन अगर 24-24 घंटे में कीमतें बढ़ रही हैं, तो कहीं तो गड़बड़ है, जिसे सत्ता का वरद हस्त मिला हुआ है। आगरा में जनता का सड़क पर उतरना इस बात का संकेत है कि अब वह यह सहने के मूड में नहीं है। यह चिंगारी है जो पूरे देश में फैल सकती है। विरोधी दलों की उदासनीता भी लोगों को साल रही है। एक स्थिर सरकार के बाद भी वह ठगा महसूस कर रहे हैं। मीडिया जड़वत खबर प्रकाशित कर रहा है। ऐसी खबरें आ रही हैं, जो केवल घटनात्मक हैं। जनता को जागरुक करने की खबरों का अभाव साफ नजर आ रहा है।
सारी दोस्तो, मैं बहुत दिनों से गायब था। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। देश में जो कुछ हो रहा है, उससे बहुत दिनों तक अलग नहीं रहा जा सकता। पूरा देश एक भयंकर समस्या से कराह रहा है। और सरकार की पैदा की गयी समस्या है यह। ताज्जुब यह है कि विरोधी दल चादर तान कर सो रहे हैं और केंद्र सरकार के नुमाइंदे स्पष्टवादिता के नाम पर जनता को लूटने में लगे हैं। मैं कल खुलासा करूंगा इस काकस का। सुबह जरूर पढ़ें मेरी पीड़ा को और आवाज लगाएं मेरी आवाज के साथ...

रविवार, 20 सितंबर 2009

मेरे दोस्त को जनम दिन मुबारक

अभी जो तीन घंटे पहले आज का सबेरा हुआ है, वह कोई सामान्य सूर्योदय नहीं है। उसमें बड़ी चेतना है। बड़ी आशाएं हैं और ढेर सारा देने की लालसाएं भी हैं। क्योकि इस सूरज में आपके पुरखों का उजाला शामिल है। यह उजाला आपके जीवन में विस्तार पाना चाहता है। यह सूरज चाहता है कि पिछले साल की गलतियां न दोहराए और अंधेरा हावी न हो, कि परेशान न रहे फिर से आज के दिन अपना जन्म दिन मनाने वाला। इसलिए मैं कहता हूं, पूरे दिन, यानि कि आज के दिन इसका एहसास रहे कि यह प्रकृति, यह कायनात और हवाएं आपके साथ हैं, उनकी वजह से खुश रह सकते हैं। और पूरे साल खुश रहना है। यह बहुत मुश्किल नहीं है। ऐसा करना है आपको।
संबंध बड़े सूचक होते हैं-सिगनीफिकेटर। संबंधों में ही पता चलता है कि तुम कौन हो। क्योंकि दूसरे की आंख में तुम्हारी जो छवि बनती है, उसी को तुम देख पाते हो, खुद की कोई छवि देखने का सीधा उपाय नहीं है। तुम सीधे तो अपने आप को देख न सकोगे। देखने के लिए दर्पण चाहिए। और प्रेम बहुत कुछ सिखाता है। प्रेम से बड़ी कोई पाठशाला नहीं है। क्योंकि प्यार से ज्यादा तुम किसी मनुष्य के निकट और किसी ढंग से आते नहीं हो। जितने तुम निकट आते हो,उतने ही अंदर की आत्मा प्रगट होने लगती है। तुम भी झलकते हो, दूसरा भी झलकता है। अब दूसरा कैसे झलके, यह उसका सिरदर्द है। और इतना समझो कि प्यार की बडी़ अनूठी कीमिया है-तुम्हारे पास वही होता है, जो तुम दे देते हो। जो तुम बचा लेते हो, वह तुम्हारे पास कभी नहीं होता। दिखता है तुम्हारे पास है, लेकिन तुम उसके मालिक नहीं होते। मालिक तुम उसी के होते हो, जो तुम दे देते हो। जो बांट दिया है, उसी के मालिक हो। इसलिए इस नए वर्ष में अपना दिल छोटा न करना, कि कुछ बचा ही नहीं है। हंड्रेड परसेंट तो अभी भी बचा हुआ है, वही हंड्रेड परसेंट जो तुमने लुटा दिया था।
प्रेम का कोई लर्निंग प्रोसेस नहीं है।
इब्तिदा में ही मर गए सब यार
कौन इश्क की इंतिहा लाया।
इसलिए खाक होने की तैयारी हमेशा रखनी चाहिए। माना कि बहुत बार ऐसा लगेगा कि बड़ी देर हुई जा रही है और बुहत बार तड़फ होगी कि अब जल्दी हो औऱ बहुत बार खुद से ग्लानि होगी, शिकायत होगी बार-बार मेरे साथ ऐसा क्यों और इतनी पीड़ा क्यों, फिर भी-
क्या उसके बगैर जिंदगानी
माना वह हजार दिलशिकन है।
बहुत दिल को दुखाने वाला है, लेकिन प्यार बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं है। आप धन्य हैं कि प्रेम के रास्ते पर दुखी हैं, वे अभागे हैं जो प्रेम का नाटक कर सुखी और प्रसन्न हैं।
एक तर्जे-तगाफुल है सौ वह उनको मुबारक
एक अर्जे तमन्ना है सो हम करते रहेंगे।
एक प्रार्थना है, जो आपको करनी है, एक उपेक्षा है जो ईश्वर कर रहा है। प्रेम के सुख तो बड़े सच्चे हैं। दुख केवल भासमान है। इसलिए बुद्धिमानों ने प्रेम चुना, बुद्धिहीनों ने अहंकार चुन लिया, हांड़-मांस चुन लिया। बुद्धिमानों ने धर्म चुना, बुद्धिहीनों ने राजनीति चुन ली। इसलिए कहता हूं, समस्या तुम्हारे अंदर नहीं है। इस साल समस्या मत बनाना प्रेम को।
प्यार में हां है, स्वीकार है, प्यार में एक अहो भाव है, गीत है, नृत्य है,संगीत है। तो लाखों विकृतियां हो गयी हों प्रेम में, तो भी प्रेम को चुनना। बाकी रास्ता तो अपने आप बन जाएगा।
जन्म दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

मेरे दोस्त को जनम दिन मुबारक

मुझे नहीं पता आप क्या थे, आज आप क्या हो, कितना अंतर है आज के औऱ कल के आप में, पता नहीं, वैसे भी मैं कौन होता हूं यह तय करने वाला, लेकिन इतना तय है कि आप हो, जहां भी हो, जैसे भी हो, टूटे-फूटे या कि पूरे या अधूरे, यदि न भी हो तो मैं कौन होता हूं, यह तय करने वाला, लेकिन एक बात जो बार-बार सुख देती है, वह यह कि कोई संघर्ष के लिए तैयार है। कोई है जो अपने वजूद के लिए खड़ा होना चाहता है। उसकी लड़ाई किसी से नहीं है, अपने आप से है औऱ ल़ड़ाई भी इतनी महीन तरीके से लड़ी जा रही है कि आप लड़ते-लड़ते थका हुआ और निराश महसूस करते हैं, कई बार पस्त हो जाते हैं, पर खड़े होने का जज्बा नहीं मरता। नितांत अकेले और बिना किसी हथियार के, जो मिला उसी में अपना साथी ढूंढते हुए। यह कैसी बेबसी है और इसका कोई अंत है भी या नहीं। लड़ाई भी न तो खत्म हो रही है और न ही तेज हो रही है। वे लोग और हैं जो बिना लड़ाई के जी रहे हैं। आप नहीं जी सकते। वे लोग और हैं, जो बिना प्रेम के जी रहे हैं, आप नहीं जी सकते। यही तो फर्क है, जो परमात्मा ने आपको दिया है। और यह जो दूसरा जन्म हो रहा है, इस जन्मदिवस के साथ, अब यह समझ लेना अच्छी तरह से कि मुस्कारहट भी श्वास है। प्रेम भी श्वास है। और जैसे बिना भोजन के आदमी मर जाता है-बिना प्रेम के आदमी मर जाता है। बिना भोजन के शरीर मरता है, बिना प्रेम के आत्मा मर जाती है। तो बिना भोजन के तो तुम जी भी सकते हो-थोड़े दिन, बिना प्रेम के तो तुम क्षण भर नहीं जी सकते। क्योंकि प्रेम ही तुम्हारी आत्मा की श्वास है। जैसे शरीर को आक्सीजन चाहिए-प्रतिपल, ऐसे ही प्राणों को प्रेम चाहिए प्रति पल। लेकिन तुम जहां भी होते हो, डरे-डरे रहते हो, कोई इंकार न कर दे, कोई छोड़कर न चला जाए, जैसे चला गया है कोई, पता नहीं कब तक के लिए। लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता। रब इतनी परीक्षा नहीं लेता, जितनी कि आपने समझ रखी है। कई बार रब सामने होता है, पता नहीं चलता, कई बार ठंडी हवाएं चलती हैं, पर पता नहीं चलता। कई बार अपने पहचान में नहीं आते। आखिर यह कैसा प्रेम है, जो आपकी प्रसन्नता के विपरीत है। यह कैसा प्रेम हुआ, जो आपको दुखी देखना चाहता है। यह कैसा प्रेम हुआ, जो आपको बांधता है, मुक्त नहीं करता। तुम्हें पता है एक होता है सुख औऱ एक होता है दुख। सब यही कहते हैं, अनुभवी और बड़े-बूढे़ भी, लेकिन यही दोनों नहीं होते। एक औऱ अवस्था है, जिसका नाम है आनंद। औऱ इसे कभी भी महसूस किया जा सकता है, सुख में भी, दुख में भी। और एक बात पते की, आनंद जितना स्ट्रगल में है, दुख में या उतना सुख में नहीं है। इसलिए हर दिन एक चेंज आपमें दिखना चाहिए, ऐसा होगा तो लगेगा कि कुछ लाइनें एक बड़ी कहानी का बीज बन रही हैं और ऐसी कहानी मैं लिखता ही रहूंगा, जो मेरी नजर में बकवास तो है, पर इतनी कोरी बकवास भी नहीं है कि उसका कोई अर्थ ही न हो। है न......और यदि मेरे से इत्तिफाक रखते हैं तो आज से कुछ बातों पर अमल जरूर करना-
जैसे कि आप अकेले नहीं हैं और किसी को अकेले रहने नहीं देंगे।
आप किसी के मालिक नहीं हैं और आप पर किसी की मिल्कियत भी नहीं है।
आप अकेले ही प्यार में नहीं हैं, और भी लोग हैं ऐसे, क्योंकि इस जगत में प्रेम है।
आप ही टूटे हुए नहीं हैं, औऱ भी हैं जो पतझड़ हैं, पर वे जमीन के उस हिस्से में समाना चाहते हैं, जहां से फिर बीज बनकर उपज सकें। इसलिए जब भी ऐसा लगे कि हाथ में कुछ नहीं रहा, तो परिस्थिति पर छोड़ देना सब कुछ...और रब इम्तिहान लेने वाला सख्त मास्टर नहीं है।
जितना आपको इतंजार है, किसी दूसरे को भी इंतजार है अपने अच्छे समय का और सच्चे दोस्त का........।
शुभ रात्रि, इस आशा के साथ कि इस रात की सुबह होगी।
और हां..कस्टमर कभी रिश्तों की दहलीज पर आकर खड़े नहीं होते, वे नए हों या पुराने। कस्टमर के जेब में पैसे होते हैं, फीलिंग्स नहीं। और फीलिंग्स का अभाव भिखमंगापन होता है।

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

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Keep blogging,
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हवन से जाएगा स्वाइन फ्लू

सम प्रीकोशनरी मेजर्स अगेंस्ट स्वाइन फ्लू-यूज ए फेस मास्क व्हैनएवर आउट, यूज ए लॉट आफ एल्कोहल सेनीटाइजर्स डिटॉल हैव बौइल्ड वाटर, वाश योर हैंड्स, मैनी टाइम्स अवाइड ईटिंग आउट साइड फूड, हैव ए लॉट आफ टाइम लाइम, विटामिन सी, कीप योर वॉडी वार्म एंड अवाइड पब्लिक यूरीनल्स, प्लीज पास दिस मैसेज टु आल कान्टेक्ट हूम यू केयर।
यह मैसेज बताता है कि स्वाइन फ्लू से लोग किस कदर दहशत में हैं। मेट्रो सिटीज में इसका हौवा ही खड़ा नहीं हो गया है, बल्कि लोग इससे तेजी से प्रभावित हो रहे हैं। इसका बचाव बताया जा रहा है आइसोलेशन। लेकिन हम यहां ज्योतिष और भारतीय औषधि परंपरा का अध्ययन करें और निर्वाह करें तो इससे बचाव का कारगर तरीका मिल सकता है। ज्योतिष शास्त्र कहता है कि जब भी चंद्र की कर्क राशि में सूर्य ग्रहण पड़ता है तो संक्रामक और नयी बीमारियां फैलती हैं। जुलाई माह में सूर्य ग्रहण के ठीक बाद ही स्वाइन फ्लू ने भारत में दस्तक दी थी।
एक और कारण जो हमें अपने अनुभव से समझ आता है, वह है सूखा। पता नहीं कोई वैज्ञानिक रिसर्च इस मामले में हुई है या नहीं, पर इतना तय है कि जब-जब मानसून की बारिश नहीं होती, इस तरह के रोग फैलते हैं। याद कीजिए वर्ष 2002,2003 का सूखा, जब इंग्लैंड से यहां आकर गाय का बुखार हौवा खड़ा कर रहा था। इसके बाद 2004 में बारिश खूब हुई और यह फ्लू चला गया। वर्ष 2005 में बारिश ने रुलाया तो चिकनगुनिया ने देश में सैकड़ों मौतें दीं। शरीर को तोड़ देने वाला यह बुखार और झटपट मौत के आगोश में सुला देने वाला यह फ्लू तीन साल रहा। 2005,2006 और 2007 में देश भर में लोग इससे मरते रहे, लेकिन 2008 में मानसून मेहरबान हो गया और इस फ्लू से निजात मिल गयी। इस साल 2009 में सूखा पड़ा तो स्वाइन फ्लू का वायरस फैल गया है। तो कोई न कोई संबंध सूखा और इस प्रकार के गंभीर वायरस के बीच है। बारिश होते ही ऐसे वायरस मरने लगते हैं।
अब श्री कृष्ण जन्माष्टमी से बारिश शुरू हुई है तो उम्मीद है स्वाइन फ्लू अपने जबड़े चौड़े नहीं कर पाएगा।
इसका दूसरा पहलू है दूषित वातावरण। हम लोग हवन-यज्ञ की परंपरा से दूर जा रहे हैं। अगर इन दिनों घर-घर छोटे हवन किए जाएं और उसमें गोबर के उपले, औपधीय वृक्षों की लकड़ी, छाल औऱ समिधा-सामग्री का प्रयोग किया जाए तो यह वायरस इक दिन में मर सकता है। दुर्भाग्य है कि सरकारें अपनी समृद्ध चिकित्सा व कर्मकांड प्रणाली पर विचार तक करना कट्टरवाद समझती हैं। बाबा रामदेव ने गिलोहे के पत्ते, तुलसी के पत्तों का प्रयोग बताया है, यह बहुत कारगर तरीका है। इन दिनों लोगों को नींबू का प्रयोग बढ़ा देना चाहिए। याद करिए चिकनगुनिया में भी तुलसी के पत्ते और नींबू डालकर गुनगुना पानी पीने से ही लाखों लोगों ने स्वास्थ्य लाभ किया था। श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व की आप सब साथी लोगों को शत-शत बधाई।
पवन निशान्त
http://familypandit.blogspot.com

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

जूते से पहचान हो मेरी

मुझे लगता है, पी.चिदंबरम की प्रैस वार्ता में जो कुछ हुआ, उसमें न तो गृह मंत्री को उतनी सहानुभूति मिल सकी है और न ही बेचारा जरनैल सिंह उतना हीरो बन सका, जितना कि उसको बन जाना चाहिए था। अजी तो फिर चूक कहां हो गयी। मेरे ख्याल से सारा श्रेय वह नामुराद जूता ले गया, जो फैंके जाने के बाद दुनिया की नजरों में आया, वरना उससे पहले तो उसकी हैसियत एक पत्रकार के पैर की जूती से ज्यादा नहीं थी।
दरअसल यह जूता इतना सैक्सी था कि जिसने भी इसे देखा, रीबाक का मान लिया। वैसे हो सकता है कि यह कोई लोकल जूता हो और हो कोई पांच सौ रुपए के आसपास का, लेकिन उसका लुक इतना हसीन था कि सबको भा गया। उससे जूते के प्रति ही लोगों का प्यार नहीं उमड़ा, बल्कि पत्रकार की हैसियत भी जूते की वजह से बढ़ी। जूता फिंकने के बाद पत्रकार की हैसियत का पता चला और पता चला कि यह वही पत्रकार है, जो नंबर वन अखबार में नौकरी करता है। कहा जा सकता है कि अखबार का नाम रोशन करने में जूते के सैक्सी लुक का बहुत बड़ा योगदान रहा।
वैसे एक पते की बात यह भी है, जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। वह यह कि जरनैल सिंह ने गृह मंत्री पर जूता फैंक कर नहीं मारा, वरन उछाला गया था। उसके द्वारा जूता फैंकने की जो फुटेज टीवी चैनलों में आ रही हैं, उससे साफ पता चलता है कि जूता फैंकने से पहले ही पत्रकार ने मन बना लिया था कि उसे फैंकना नहीं है, बल्कि उछालना है। उछाला भी इस तरह गया कि उसका कोण नब्बे डिग्री का न होकर एक सौ बीस डिग्री के अधिक कोण में ज्यादा था।
जरनैल सिंह की यह प्रीप्लान्ड प्लानिंग हो सकती है और हो सकता है कि उसने यह जूता बनाने वाली कंपनी से पहले कोई डील की हो कि वह उक्त जूता कंपनी का बहुत बढ़िया ब्रांड अंबेसडर हो सकता है। आपको याद होगा कि इराक में जब जूता फैंका गया तो उसके बाद पूरे देश में जूता फैंकने का रिवाज सा चल गया और देखते ही देखते वह जूता बनाने वाली कंपनी जो दिवालिया हो गयी थी, उसे लाखों जूते बनाने के आडर्र मिल गए थे।
ऐसा अपने यहां क्यों नहीं हो सकता। आपको शायद मालूम होगा कि आज बुधवार को जब जरनैल सिंह ने गृह मंत्री का शुक्रिया अदा किया है, उसका कंपनी के फ्रैंचाइजी, वितरक, डीलर व रिटेलर पर कोई फर्क नहीं पड़ा, बल्कि कंपनी से आर्डर निकलने शुरू हो चुके थे। मेरे यहां जैसे छोटे शङरों के जूता दुकानदार ऐसे जूतों को ढूंढ-ढूंढ कर परेशान थे, लेकिन एक पीस जूता नहीं मिल पा रहा था।
जरनैल ने जानबूझकर जूता उछाला, यह तय है। उसे पता था कि जूता फैंक कर मारने में तीन साल की सजा हो सकती है, जैसे कि इराक वाले भाई को हो चुकी है, जबकि जूता उछालने पर कोई आफैंस नहीं बनेगा। जूता उछालने पर कांग्रेस भी खुश हुई और उसे मुकदमा दर्ज न कराने का बहाना मिल गया, जबकि सिख संगठनों को एक मुद्दा मिल गया। तो भइया मेरे, यह लोकतंत्र है, लोकतंत्र का सबसे बड़ा मेला चालू आहे। ऐसे में जो बाजीगरी न कर पाए, वह बेवकूफ है, जरनैल सिंह नहीं। हम पत्रकार जो हमेशा दूसरों को हाईलाइट करते रहते हैं, अगर कभी खुद हाईलाइट होने का ख्याल कर लें, तो इसमें बुरा क्या है।
-पवन निशान्त

सोमवार, 9 मार्च 2009

होली में...

मिलाएंगे गला उनसे
सरे बाजार होली में
ये है नहीं मुमकिन
कि वह कर सकें
हमें इंकार होली में

रविवार, 8 मार्च 2009

होली में तुम्हारा स्मरण

पिचकारियों के मौसम में
और स्मृतियों के धुंधलेपन में
मन में कुछ घुलता सा
सफेदी के डेले की तरह
विस्फोट करता
मन में कोई ढूंढता सा
नामजद किंतु गुमशुदा दोस्तों को

लाल खून से लिखे शिलालेखों पर
कुछ उकेरता सा
दिन की तरह
बेचैनी लेकर
और फिर कुछ डूबता सा
झुंझलाकर उदास
दिन ही की तरह

सागर की गहराइयों में
या अंतरिक्ष की जमीन पर
गुम हो जाने वालो
होली में तुम्हारा स्मरण
पानी में घुलकर उतर रहा है टेसुओं से

रविवार, 25 जनवरी 2009

हमारे समय की तस्वीर

ऐसे समय की
तस्वीर चाहते हैं हम लोग, जिसमें
सभी कुछ हो सभ्य, शालीन और सुसंस्कृत

तस्वीर में समय हंस रहा
अठखेलियां कर रहा हो
बच्चों के साथ
बूढ़ों के साथ बैठा हो चारपाई पर
समय चाहे हो घर से बाहर
पर मुकम्मल तौर पर घऱ लौटता हो
जैसे लौटता है गणतंत्र दिवस
और न भी लौटता हो
तो भी विश्वास हो हमें कि
लौट आएगा एक दिन

समय जाता हो दिल्ली-कोलकाता
यात्रा करता हो मेट्रो या ट्राम्वे से, किंतु
जब भी घर लौटा हो तो
इस तरह नहीं, जैसे
दफ्तर से लौटता है
किसी का पति, भाई या बेटा
थका-थका सा, बोझिल और टूटा हुआ

हम लोग आए हैं
बंगलुरू से, अहमदाबाद से
भुज से, भोपाल से भी आए हैं कुछ लोग
कुछ लोग आ रहे हैं नंदी ग्राम से
और जो नहीं आ सके हैं लातूर से, मुंबई से
या ताज-ओबेराय से, उनकी लाए हैं हम पसंद
हम लोग ऐसे समय की
तस्वीर चाहते हैं
जो बूढ़ों की तरह खूंसट न हो
बहरा न हो अतीत सा
फुसफुसाता न हो
फटने वाले बारूद की तरह
तस्वीर में भी, डरावना
न हो मृत्यु सा
वह इस सदी सा न हो
और ऐसी ही कई सदियों सा भी न हो
उसमें मंदी न हो महंगाई न हो
बाटला हाउस की जग हंसाई न हो

वह तो ऐसा हो
जिसे हम ले जा सकें
अगली सदी में
जैसे लोग ले जाते हैं
कोई भेंट, कोई उपहार किसी की खुशी में
प्रेमी देते हैं जैसे सरप्राइज
और जैसे हम ले गए थे
हाईस्कूल में पास होने की खबर
अपने घर

कृपा करके पहले हमें
हमारी तस्वीर बना दीजिए

शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

चल दिए हैं पूस के तानाशाह

अभी अभी जड़ था कबूतर
वर्फ की पहाड़ सी परत में
अभी अभी हुआ है चेतन
सूर्य के पहले प्रकाश में

रोंया रोंया शुष्क था मौसम
मौत की पगडंडी पर
अभी अभी पिघला है
जीवन की ताल तलैया में

घर घर सोया पड़ा था आदमी
कुछ सुध कुछ बेसुध
अभी अभी जागा है हौसला
ताल ठोंक कर गांव गांव

शाख शाख पसरी थी रात
चंगेजी ठंड के शासन में
अभी अभी हिनहिनाने लगे हैं घोड़े
चल जो दिए हैं पूस के तानाशाह

मंगलवार, 6 जनवरी 2009

डरी हुई है धूप

कुछ अवसाद सा घुल रहा है मौसम में
धूप के साथ-साथ
धूप डरी हुई है
कुछ दिनों से

पहले धूप होती थी खिलंदड़ी
चाहे जहां आकर बैठ जाती थी
पक्की छत पर
छत की मुंडेर पर
कच्चे आंगन में, बरामदे में
पूरा घर और घर के बाहर
अपने आप उग आयी अयाचित घास पर

पहले धूप मांगती थी-
खुली खिड़की
खुला रोशनदान
हो सके तो छोटा सा कोई संद या मोखला

जब सबको था विश्वास
धूप नहीं छोड़ेगी साथ
मरते दम तक
पहले कोई नहीं करता था बात
धूप के बारे में
धूप भी नहीं चाहती थी करे कोई बात
उसके बारे में

जब धूप थी, हम थे
हम थे और हमारा संसार था
पर नहीं था कोई तो धूप और हम
पहले धूप बहुत गरम थी न ठंडी
बस गुनगुना करती थी तन को
तन पर पड़ी कमीज को
कमीज की जेब में रखे ठंडे प्रेम पत्र को
हम कभी खर्च नहीं करते थे बीस रुपया
कलेंडर को कि कब आएगा माघ-अगहन

डरी हुई धूप देखकर
फुसफुसा रहे हैं हम
हम जानते हैं लगातार समा रहा है
हमारे भीतर डरी हुई धूप का डर
डर का अवसाद
हम समझ रहे हैं कि
डरी हुई है धूप
और डर बन रहा अवसाद

डर झांक रहा बार बार
मन से बाहर
जहां धूप इस तरह दिखती
कि केवल तन को गुनगुना करेगी
पर मन को भी गुनगुना कर देती थी

हाइवे पर खड़ी है धूप
और बेरियर पर टोल टैक्स मांगा जा रहा है उससे
जाने क्यों ठंडा हो गया है धूप का भेजा

गुरुवार, 1 जनवरी 2009

विचलित हुआ नया खून

नव वर्ष की आत्मीय शुभकामनाओं के साथ--
अच्छा हुआ
आ तो गया पूस
धुन भी गयी जड़ कपास

अच्छा हुआ
फुटपाथियों को भी याद आयी रुई
गर्म हो गयी कल्लू की दुकान

अच्छा हुआ
जम गयीं लाल रक्त कणिकाएं
किसी के हिंसक आह्वान पर

अच्छा हुआ
सब एकमत तो हुए
एक रजाई की वजह से

अच्छा हुआ
विचलित हुआ नया खून
ऋतु के गिरते तापमान में।।

मेरे बारे में

mathura, uttar pradesh, India
पेशे से पत्रकार और केपी ज्योतिष में अध्ययन। मोबाइल नंबर है- 09412777909 09548612647 pawannishant@yahoo.com www.live2050.com www.familypandit.com http://yameradarrlautega.blogspot.com
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