रविवार, 31 अगस्त 2008

बड़बड़ा रही है कविता

कवि ने लिखी सचमुच की कविता
और सपने में मिला उसे पुरस्कार

कवि ने कैनवस पर उतारे शब्द चित्र
मन में कुलबुला गयी कोई पीड़ा

कवि ने हाथों-हाथ लिया उसे
पर सिर चढ़कर बोली
उसकी गरीबी

कवि ने बख्शी उसे उसकी इज्जत
पर कवि के लिए रचे गए
पीड़ा के छंद

कवि ने अग्नि से पूछा उसका संताप
और जल उठे उसके अपने रक्त संबंध

कवि ने जाननी चाही
हवाओं से उनकी थकान
और ढेर हो गया उसका अपना हमसफर

कवि जब चुप हुआ तो
बड़बड़ाने लगी उसकी कविता

-क्या सबेरे के सूरज में
कवियों के पुरखों का उजाला शामिल नहीं है

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मेरे बारे में

mathura, uttar pradesh, India
पेशे से पत्रकार और केपी ज्योतिष में अध्ययन। मोबाइल नंबर है- 09412777909 09548612647 pawannishant@yahoo.com www.live2050.com www.familypandit.com http://yameradarrlautega.blogspot.com
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